गुफ़्तगु – The Monologues…

Finally sharing this first attempt at Urdu poetry which I had written for an anthology (Amravati Poetic Prism 2016) some time back..

There’s a deeper meaning about this, which helped creating this. Being miles away for the first time from your loved ones, makes you miss them a lot more, probably indescribable. 🙂 Still you just cling on to the hope that this too shall pass soon and there would be a happy reunion soon…

गुफ़्तगू  

घूमे हम हर गली ढूंढते बस इक झलक,download

बांधे रखे मुट्ठी में लम्हा लम्हा देर तलक

जाने कैसे ज़माने थे, गिनते थे दिन बस उँगलियों पर,

न जाने कितने महीने गुज़र गए हैं सिर्फ़ उम्मीदों पर

चाहना हर बात पे, इन पलों में होते तुम साथ अगर,

वक़्त ही कुछ और होता, रहता न अधूरा कोई सफर

सोचा किताबों में ही डूबें , भूलें तुम्हें कुछ तो मगर,

बात वो और थी कि हर पन्ने में आये तुम ही नज़र

चाय की उन चुस्कियों में जितनी खुशियां बटोरे,

लाख कोशिश बाद भी अब सारे घूँट फीके रहे

कहने को जीने के सलीके इस पार भी खूब मिले,

यूँ तो हर लम्हे में रहे, फिर भी न क्यों पूरा जिए

समेटे सब इक पोटली में, जितनी बातें थी यूँ ही,

सोचा, रखेंगे तुम्हारे सामने, कहेंगे बस इतना ही:

“खोलिए हर गिरह धीरे-धीरे, रह न जाए किस्सा कोई,

समझिए इन्हें प्यार से, होते हैं नाज़ुक अल्फाज़ भी”

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